सकूँ की नींद

Published on by Sharhade Intazar

इंसानियत के नाम,

इंसानियत के नाम,

इश्क में नींदों के उड़ जाने का सबब,
मेहबूब के दीदार में खो जाने का सबब ,
इक नींद ही तो है उसके ख्वाब आने का सबब,


भूख में सकूँ की नींद कब हासिल हुई,
करवटों में रात कटती ही हासिल हुई ,


जुर्म के बाद की नींदों में सकूँ मिलता कहां है,
जहन में चुभता गुनाह का खंजर यंहा है,
फिर सहारा हकीमो का लेकर है जीता,
गुनहगार फिर चैन से सोता कहा है,
नींदों में भी चीखा करता रहा है,
वो जो अपने गुनाह को रोता रहा है,


सकूँ की नींद देता है खुदा बस उसको,
जो इंसानियत में जीता है बस खुदको,
दौलत की रहती है नहीं भूख बस जिसको,
मेहनत की रोटियां चैन दिला देती है उसको,
नींदों में खुदा की लोरियाँ सी,
ख्वाबों में भी परियाँ सुलाती हैं उसको,

 

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