कलम खुदा की

Published by Sharhade Intazar

जुबानी इंसा की,

जुबानी इंसा की,

खुदा की कलम ने लिक्खे नसीब कई,
कुछ को दी कलम ेऐसी
जिसके किस्से हुए अजीब कई,
किसी कलम ने संवार दीं ज़िंदगियाँ कई,
तो किसी ने करदी ज़िंदगियाँ तबाह कई
कलम वो भी थी जिसमें धड़कने सिमटी,
मोहब्बत को दे दी जिसने जुबाँ नयी,
किसी कलम ने समेटा दर्द यंहा
तो किसी ने बिखेर दी खुशियां कई ,
ज़िन्दगी के सफर ने  कलम का साथ यूँ किया,
के इंसा के हाथों खुदा लिखता रहा दास्ताँ नई नई
फिर वो कलम भी उठवाई इंसा से खुदा ने,
जिससे लिखता था वो रोज एक मौत नई,
फिर भी ज़ीने को मोहलत मिल ही जाती थी,
के खेलता हो जैसे खुदा खेलों में खेल कई

 
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